त्योहारों के इस मौसम मैं
घर की याद बहुत याद आती है
मीठे पकवानों की खुसबू हमेसा
अभी भी जुवा से नहीं जाती
जिन्दगी ने हमें किस मोड़ पर
ला दिया अब तो घर
दिल से ही नजदीक है
सपने मैं याद आता है अपना बचपन
जब हम त्योहारों का इंतजार करते थे .
10/30/2010
त्योहारों के इस मौसम मैं
10/29/2010
सच का सामना
कितनो ने किया है अब तक सच का सामना
सच जो की कड़वा हो सुनने मैं बुरा हो
सच का सामना इतना आसान नहीं
क्यों की जो दिखता है वो सच नहीं
सच तो चुप है जो किसी से बोलता नहीं
सच की चुप्पी ऐसी है की जैसे कुछ हो ही नहीं
सच अनंत आकाश मैं फैला हुआ है
बस दिल से उसे देखो और अपना लो
10/25/2010
अग्निपंख
सूर्य सा धधक
अग्नि सा तप
खुद को जला
और जल के
अग्निपंख सा निकल
तेज से समर को जीत
अहग को तू जला
धधक-धधक अग्नि सा
जल के अग्निपंख सा निकल
अदम्य साहस तुझ मैं भरा
ज्वाला सा तू जल रहा
कर दे राख उन को
जो तेरी आँखों मैं
देखने की हिम्मत करे
तू किसी से न डरे
तू किसी के सामने न झुके
शीश उनका दे गिरा
जो तेरी तरफ उठे
जल के अग्निपंख सा निकल
10/22/2010
क्यों तुम इतना याद आ रहे हो..
जब भी याद आता है तेरा चेहरा
हमारा दिल च्हुँक उठता है
मगर अगले ही पल वो शांत सा हो जाता है
मैं ने चाहा की तुम याद न आओ
मगर तेरे यादो ने ऐसा होने ना दिया
दिल की बगिया अभी उजरी -उजरी सी है
तेरी हसी की यादो ने उस मैं फूल ही फूल खिला दिए
ये जमी बंज़र सी दिखती है तेरी यादो मैं
लेकिन तेरी आँखों की यादो ने इनमें भी सैलाब ला दिया
क्यों तुम इतना याद आ रहे हो ….