Ratnakar Mishra

01/20/2011

India ऐसा भी है…

Filed under: कहानी — ratnakarmishra @ 11:12 am

रात के अँधेरे मैं जब एक हाथ को दूसरा हाथ नहीं दिख रहा था , मैं उस छोटे से गावं के बस स्टैंड पर उतरा.रात के ११ बाज़ रहे होगे चारो और सन्नाटा था , बीच-बीच मैं रह कर कुछ अजीब सी आवाज़े आ रही थी.. मैं ने अपना बैग कंधे पर डाला और दूर नज़र आती रोशनी का पिछा करने लगा , वो रोशनी तो रेगिस्तान के मृग तृष्णा की तरह थी , मैं अपने मोबाइल टोर्च की मदद से रास्ते को टोहता हुआ आगे बढ रहा था और मन ही मन मोबाइल कंपनी वालो को धन्यबाद दे रहा था . जब मैं रोशनी के करीब पहुचा तो ,देखा एक टुटा हुआ कच्चा सा मकान था , एक जोड़ी बैल बंदी थी , लालटेन की रोशनी मैं जैसे सब कुछ चमक रहा था , बाहर खाट लगी थी और उस पर कोई सो रहा था , अजनबी की गंद सायद जानवर जानते है मुझे देख कर उन दोनों बैल ने अजीब सी आवाज़ निकाली , बगल मैं पड़े खाट पर सोये उस आदमी की नीद जाग गयी सायद उस ने जोर – जोर से हूश -हूश किया लेकिन उन बैलो पर कोई असर नहीं हुआ ,इतने मैं उस ने मुझे देख लिया ….

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