Ratnakar Mishra

10/29/2011

अंजान

Filed under: Social issue — ratnakarmishra @ 4:41 pm

रात के २ बज रहे होगे सायद उस ने अनुमान लगया ,घर मैं सभी सो गए होगे या जाग रहे होगे ? वो ये सोच रहा था , अरे ये शहर तो काफी बदल गया है, यहाँ पहले एक मैदान हुआ करता था मगर उसकी जगह अब एक बड़े मुल्तिप्लेक्स  ने ले ली थी , यही पर बचपन मैं वो अपने दोस्तों के साथ क्रिकेट खेला करता था ,  सारे शहर मैं तो जैसे सडको का जाल  बुन दिया गया है  , सारी सड़के उस को अंजान लग रही थी. रात की रोशनी मैं उसे अपना शहर ही अनजान लग रहा था , जहा उसने अपने जीवन के २० साल बिताये थे , अरे भैया ये कहा से ले जा रहे हो सही रास्ता तो ये है ना उस ने ऑटो वाले से पुछा , अरे आप नए आये हो क्या यहाँ , हम यदि वो रास्ता लेगे तो २ किलोमीटर आगे से घूम के आना पड़ेगा  ऑटो वाले ने  कहा  , अब अपना शहर ही अंजान लगने लगा उस ने सोचा , उसे अभी भी यकीन नहीं हो रहा था की जब उस ने ये शहर छोड़ा था और जब वो ८ साल बाद वापस आ रहा है तो ये इतना  कैसे बदल गया की , उस के अपने शहर ने उस को पहचाने  से इंकार  कर दिया .

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