Ratnakar Mishra

04/03/2012

बिहार के सपुत

Filed under: Social issue — ratnakarmishra @ 4:04 pm
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कहते है कि शेर यदि बुढा भी हो भी जाये मगर वो शिकार अपने ही हाथो से ही मार के खाता है उम्र के साथ-साथ उसके पंजे कि धार और भी तेज होती जाती है .जब अंग्रजो के खिलाफ 1857 मैं विद्रोह भड़का था तो ,बिहार के एक सपूत ने East India Company के खिलाफ 80 बर्ष कि आयु मैं वगावत का बिगुल फूक दिया और अनेको लड़ाई जीती अंग्रजो के खिलाफ .

जी हां,हम यहाँ बात कर रहे है बिहार के एक ऐसे सुरमा कि जिसने अग्रजो को पानी पीला दिया ,अपनी उम्र कि परवाह नहीं करते हुए उन्होंने ऐसी लड़ाई लड़ी कि इतिहास मैं अमर हो गए.

बिहार के सुरमा “कुंवर सिंह” .1777 मैं जगदीशपुर ,आरा (बिहार) मैं उनका जन्म हुआ .

1857 मैं अंग्रजों के खिलाफ पहली चिंगारी भड़की उस समय कुंवर सिंह , जगदीशपुर के जमींदार थे ,उन्होनें ने उम्र कि परवाह नहीं करते हुए ,अंग्रजों का जम कर मुकाबला किया 5 July 1857 को दानापुर को अंग्रजों से मुक्त करने के दो दिन बाद उन्होंने आरा पर भी कब्ज़ा किया ,मगर 3 Augest 1857 को अंग्रजों ने उनकी सेना सहित जगदीशपुर को तबाह कर दिया ,फिर कुंवर सिंह ने अपना घर छोड़ दिया और वे लखनऊ चले गए ,March 1958 को  आजमगढ़ को अंग्रजों से मुक्त करने के बाद वे वापस अपने घर जगदीशपुर आ गए.

23rd April 1858 को गंगा नदी पार करते समाये उन के हाथ मैं गोली लग गयी ,उसी समय उन्होंने अपना हाथ काट कर गंगा मैया को भेट दे दी .मगर उसके के अगले ही दिन 24th April 1858 को वो अमर हो गए .

उन्होंने जिस अदम्य साहस का परिचय देते हुए लड़ाई लड़ी कि अंग्रजों तक मैं उनके नाम का कौफ हो गया कि कब ये बुढा शेर उनपर हमला न कर दे .

“ऐसे बिहार और देश के लाल को हमारा शत्-शत् नमन.”

 

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