Ratnakar Mishra

04/28/2012

बाबा कि जय हो !!!

Filed under: Social issue — ratnakarmishra @ 12:17 pm

Sunday के दिन सुबह के @6 बजे यदि आप का कोई कॉल-बेल दबा कर आप को परेशान करेगा तो आप क्या करेगे ..नहीं-नहीं आप गलत सोच रहे ..मैं तो उसे गोली मार दूँगा मगर क्या करू माध्यम वर्गीय परिवार से हूँ सर दर्द कि गोली से फुर्सत मिले तब न, जा कर कोई दूसरी गोली के बारे मैं सोचू . खैर जाने दीजिए सबो का यही रोना है , मैं ने  दरवाज़ा खोला तो देखा हाथो मैं फलो का टोकरा पकड़े गिरिजा बाबु खड़े थे . मिश्रा जी ये टोकरा पकडिये मेरे कुछ बोलने से पहले ही उन्होंने टोकरा मेरे हाथ मैं थमा दिया ,बहुत बजनी था मेरे ख्याल से दस सेर तो जरूर होगा ,और हां आप जरा तैयार होकर जल्दी मेरे साथ आईए ,बहुत जरूरी काम है ,

गिरिजा बाबु ये फल ?

अरे आप के लिए ही है ,जल्दी जाइये और बापस आईए .

मैंने उस टोकरो को रखा और देखने लगा ,उस मौसम के सारे फल थे ,मुझे उस समय अपने पर यकीन नहीं आ रहा था मुझे लग रहा था कि मैं कोई सपना देख रहा हूँ .

फिर @9 बजे वो मुझे ले कर एक माल मैं आये और मुझसे कहा आप को जो भी खरीदना है ले लीजिए .बिल कि चिंता मत कीजिए मैं दे दूँगा .

मैं ने बड़े विस्मयकारी भाव से गिरिजा बाबु कि और देखा ,पिछले दो साल से ये मेरे पड़ोसी है ,आज तक एक कप चाय के बारे मैं इन्होने नहीं पूछा मगर अचानक ही इन्हें हो क्या गया है .

खैर मुझे क्या मैं ने अपनी जरुरत के सारे सामान के साथ –साथ जिसकी जरुरत नहीं तो वो भी खरीद डाली ,उस समय यदि कोई मुझे देख लेता तो यही सोचता ,कि मैच के आखरी ओवर मैं सहवाग कि तरह खरीदारी मेरा मतलब है बलेबजी कौन कर रहा है ,

बिल चुकाने के बाद गिरिजा बाबु ने कहा ,मिश्रा जी आप अपना सन्डे और कैसे मानते है ,कही रेस्टोरेंट मैं खाना –वाना ….

नहीं –नहीं ऐसा कुछ नहीं ,मैं ने सोच वैसे ही पुरे 12000/- कि चपत लग चुकी है इनकी ..

अरे कुछ नहीं मिश्रा जी आज हम आप के लिए किसी अच्छे से restorent से खाना मँगवा लेते है ,veg या non-veg..

कुछ भी चलेगा मैं ने कहा

बस फिर क्या था उन्होंने फोन घुमा दिए ,

दोपहर मैं मैंने छक कर खाना खाया ,फिर सो गया ,

शाम मैं गिरिजा बाबु फिर एक बड़ा सा पैकेट ले कर आये ,बोले ये हमारी तरफ से आप को गिफ्ट .

“तो दिन भर आप जो दिया वो क्या था मैं ने सोचा “,मगर मेरी पूछने कि अब हिम्मत नहीं थी ,उनका बहुत सारा नमक खा चुका था मैं .

उनके जाने के बाद मैंने पैकेट खोला तो उसमें से एक फोन और कुछ CD थी ,मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था ,मैं ने अपने लैपटॉप मैं CD डाली और देखने लगा , वो किसी बाबा का दरवार लगा था ,बाबा प्रवचन दे रहे थे ,कुछ देर बाद कुछ लोग लाइन मैं लग कर अपना दुःख बता रहे थे ,और बाबा मंद-मंद मुस्कान ले कर सबो को उनके दुःख से उबरने का उपाय बता रहे थे ,और आप लोगो को जान के आश्चर्य होगा कि गिरिजा बाबु ने जो किया वो उसी बाबा का बताया हुआ उपाय था कि ,अपने पड़ोसी को खुश करे “कृपा अपने ही आने लगेगी “.

 

 

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