Ratnakar Mishra

03/30/2013

ऐसा क्यों होता है …

Filed under: Social issue — ratnakarmishra @ 12:22 pm

जब सोना चाहता हूँ तो बिस्तर नहीं मिलता …जब रोना चाहा तो जिंदगी ने खुशी दे दी …जब खुश होना था तब जिंदगी  ने  रुला दिया …कम्बक्त जिंदगी ने चाय के टाइम पर खाना खिला दिया ….और खाने के टाइम पर चाय …अब सूरज मेरा कोई चाचा नहीं है ..और चंदा कोई मेरा मामा नहीं है कि …मेरे लिए अपने उगने और डूबने का टाइम बदल दे ….बस जैसा चल रहा है चलते रहने देना चाहिए …..यही जिंदगी का उसूल है …मगर क्या करे कम्बक्त ये दिल …

वैसे यदि जिंदगी कहानी कि तरह होती …वो भी छोटी कहानी कि तरह तो मज़ा ही आ जाता …कितनी बार ऐसा होता है कि आप छोटी कहानी पढ़ना शुरू करते है …और जैसे ही मज़ा आने लगता है …कहानी खत्म …..जब भी मैं छोटी कहानी लिखता हूँ या पढता  हूँ तो ऐसा लगता है कि नशे का छोटा -छोटा खुराख ले रहा हूँ …जिससे जिंदगी मैं मज़े आते रहते है .

असंतोष जिंदगी कि एक ऐसी जरुरत है जिसके बिना आप न तो आप जिन्दा रह सकते है और न ही छोड़ सकते है  …..बस ऐसे ही चलते रहना चाहिए …..

 

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