Ratnakar Mishra

01/11/2016

इशक़यापा थोड़ा सा और इश्क़ या स्यापा होता तो कहानी और भी मज़ेदार होती

Filed under: Review — ratnakarmishra @ 6:16 am

इशक़यापा थोड़ा सा और इश्क़ या स्यापा होता तो कहानी और भी मज़ेदार होती

ratnakar mishra
कहानी पूरी तरह से हिंदी फिल्मो से प्रभावित है ,शुरुवात मज़ेदार है ,मगर जैसे-जैसे आगे बढ़ती है ,रोमांच खोते जाती है ,कहानी मैं न तो ढंग से रोमांस दिखाया गया है और न ही दबंगई ,दुबे जी के कदम सराहनीये है उन्होंने दबंग पिता के सीने मैं बेटी के लिए प्यार ,बफादार नौकर का चरित्र ये सब कहानी को बाँध के रखे है,मज़ेदार बात ये है की नावेल  की थीम बिहार पर है , मगर पूरी किताब मैं कही भी बिहारी टोन नज़र नहीं आया और ख़ास कर पटना वाला तड़का तो जरा सा भी नहीं था ,न ही पटनिया खड़ी बोली और अख्हड़पन ,फिर भी पांच मैं से तीन अंक थो इन्हे मिलना ही चाहिए .

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