Ratnakar Mishra

12/19/2016

देल्ही दरबार के का कहने

Filed under: Social issue — ratnakarmishra @ 3:24 pm

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रविवार को भोरे -भोरे फ़ोन आया हमरे एक दोस्त का पूछा का कर रहे बे मिश्रा !

हम देल्ही दरबार लगा के बैठे है बे ,तू सुना

अबे साले अब कहने  और  सुंनाने के लिए का रहा है बे ,भोरे -भोर हमको अकेले छोड़ के निकल लिए देल्ही दरबार ,

ससुरा बड़का खौवाक हो बे सुबहे -सुबहे चिकेन तोड़ने पहुच गए  .

अबे गलतफहमी के चूरन हम किताब पढ़ रहे है,सत्य व्यास भैया का ” देल्ही दरबार”  न की चिकेन तोड़ रहे है  देल्ही -दरबार रेस्टोरेंट मैं .

ओह्ह जे बात ,पढ़ लोगो तो हमको भी देना जरा ,

जरा का बे ,संगीतया पे रोजे सौ -दू सौ उड़ता है  बे  ,अमेज़न से खरीद ले ,हमरे पास ऑटोग्राफ वाला है,हम न देंगे .

बस यही दोस्ती और प्यार बीच मैं आ गयी व्यास भैया की किताब ,सौरभ ने टोन मारा मेरे को

ठीक है ठीक ले लियो मगर पिछली बार की तरह  इसे भी गुम मत कर दियो .

कौन सा किताब हम तुम्हारा गम किये है बे ?

“बनारस टाकीज ”

वो उ तो हम गिफ्ट कर दिए थे ,सुरभि को

साला अभी बता रहा बे ,आ सामने ऐसा रगड़े गे न की ….

मेरी बात को बीच मैं ही काट के उसने कहा अबे उ हमसे सेट हो गयी थी , बनारस की थी न ,इस लिए दिए थे गिफ्ट मैं

ओह्ह ,रख फोन रख अब लियो मेरे से कोई किताब .

अरे बुरा मान गए बे ,कोई बात नहीं किताब मत दियो मेरे को मगर कहानी के बारे मैं बता दियो .

रख फोन रख फ़ोन बे

रख रहे है का भाव खा रहा है वैसे फ़ोन तो तू भी काट सकता है न बे

रख -रख ….

 

 

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