Ratnakar Mishra

06/11/2016

मोबाइल दुकान वाले भैया एक मोबाइल दिखा दे

Filed under: कविता — ratnakarmishra @ 7:27 pm

one plus one आया ,one plus two आया और चला भी गया ,अब one plus three  का इंतजार हो रहा है ,इस तरह से मोबाइल के नाम रखे जाते रहेगे तों one plus one four hundred twenty भी हो जायेगा ,अब सैमसंग ने s1 ,s2 जैसे नाम रखे जो की ट्रेन की कोच के नाम से मेल खाते है ,एप्पल ने एप्पल से शुरुवात  की मगर अभी 6s और 6s plus पर अटकी है ,चाहे कुछ भी हो नाम के मामले मैं  micromax ने सब को पीछे छोड़ दिया ,LAVA or VIVO  दो नए ब्रांड ने तो ऐसे –ऐसे सपने दिखाए जो की एप्पल भी पूरा न कर सकी ,इस बीच अपनी मोटो ने भी बारिश मैं न भीगने वाली फ़ोन ला कर सबको चकित कर दिया वैसे यदि आप अभी कोई नया फ़ोन खरीदने का सोच रहे है तो निम्न बातो का ख्याल रखे तो अच्छा है वरना पैसा आपका आप जानो

नंबर एक – आपके मोबाइल मैं इतना बड़ा बेट्री होना चाहिए की आप उससे साथ दिन तक लगातार बात कर सके

नंबर दो –कैमरा चाहे जैसा भी हो मगर मेगा पिक्स्सल के मामले मैं 21 से कम नहीं होना चाहिए

नंबर तीन –सेल्फी लेने के लिए चहेरा अपने आप टेडा हो जाये ऐसा मोबाइल होना चाहिए

नंबर चार –इतना पतला हो की ,आप उससे अपनी सेव कर सको

नंबर पांच –मोबाइल मैं कम से कम पांच बकवास feature  होना चाहिए ,जैसे फिंगर सेंसर ,ऑटो answer जैसे फीचर जो कभी –कभी इस्तेमाल मैं आते है ,मगर showoff  के लिए जरुरु है

नंबर छ :- स्क्रीन का साइज़  macbook से छोटा और ipad से बड़ा होना चाहिए .

अब ऐसे फ़ोन को ऑनलाइन सर्च कीजिए और आर्डर कीजिए फिर like और comment  कीजिए गा

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07/20/2013

जब चला था

Filed under: कविता — ratnakarmishra @ 12:50 pm

जब मैंने   शुरवात कि थी  तब  से भी अकेला था

रास्ते मैं  कुछ अजनबी ने दोस्त बनने की कोशिस कि

मगर पीछे मुड़ के देखा तो मैं अकेला ही दौड़ रहा था ,

मंज़िल अभी भी बहुत दूर दिख रही है ,मगर मैं अकेले ही चल रहा हूँ

क्योंकि ये मेरी मंज़िल है और मेरे रास्ते है …

 

 

10/30/2010

त्योहारों के इस मौसम मैं

Filed under: कविता — ratnakarmishra @ 2:48 pm

त्योहारों के इस मौसम मैं
घर की याद बहुत याद आती है
मीठे पकवानों की खुसबू  हमेसा
अभी भी  जुवा से नहीं जाती
जिन्दगी ने हमें किस मोड़ पर
ला दिया अब तो  घर
दिल से ही नजदीक है
सपने मैं याद आता है अपना बचपन
जब हम त्योहारों  का इंतजार करते थे .

10/29/2010

सच का सामना

कितनो ने किया है अब तक सच का सामना
सच जो की कड़वा  हो सुनने मैं बुरा हो
सच का सामना इतना आसान नहीं
क्यों की जो दिखता है वो सच नहीं
सच तो चुप है जो किसी से बोलता नहीं
सच की चुप्पी ऐसी है की जैसे कुछ हो ही नहीं
सच  अनंत आकाश मैं फैला हुआ  है
बस दिल से उसे देखो और अपना लो

10/25/2010

अग्निपंख

Filed under: कविता — ratnakarmishra @ 5:31 am
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सूर्य सा धधक
अग्नि सा तप
खुद को जला
और जल के
अग्निपंख सा निकल

तेज से समर को जीत
अहग को तू जला
धधक-धधक  अग्नि सा
जल के अग्निपंख सा निकल

अदम्य साहस तुझ मैं भरा
ज्वाला सा तू जल  रहा
कर दे राख उन को
जो तेरी आँखों मैं
देखने की हिम्मत करे
तू किसी से न डरे
तू किसी के सामने न झुके
शीश  उनका दे गिरा
जो तेरी तरफ उठे
जल के अग्निपंख सा निकल

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