Ratnakar Mishra

03/14/2018

डार्क नाइट वाला प्यार

Filed under: Social issue — ratnakarmishra @ 5:24 pm

डार्क नाईट

संदीप भैया ने अपने फेसबुक वाल पे सतीश यादव जी द्वारा बनाया गया एक खुबसूरत फोटो डालते हुए मुझे लिखने को उकसाया और मैंने भी इसे  यूपी और बिहार उपचुनाव  की तरह लिया और रिजल्ट आपके सामने है ,पढ़िए और मज़ा लीजिये दोनों का …

बारिश की एक शाम ,दिन भर झम –झम करते अब वो थक गयी थी .बड़ी खुशनुमा शाम थी, कबीर और माया एक दुसरे का हाथ थामे लंदन की गलियों मैं चहलकदमी कर रहे थे .

कबीर अपनी जिन्दगी से खुश नज़र आ रहा था ,एक नज़र उसने माया की तरफ डाली ,ये वही पल था जब माया और कबीर दोनों की नज़रे मिली और दोनों के कदम ठहर से गए ,स्ट्रीट लाइट की रोशनी मैं लाल रंग के कपडों पहने हुए माया उसे परी सी लगा रही थी ,माया का स्पर्श उसे जादू भरी दुनिया मैं ले जा रहा था ,उसने माया को अपनी बाहुपाश मैं लिया ,दोनों की गर्म सांसे टकराई एक नज़र उठा के माया ने कबीर की तरफ देखा फिर वो भी उस जादू मैं घिरती चली गयी दोनों के होठ कभी न अलग होने की कसमे ले कर एक दुसरे मैं  समां गयी .

कबीर सबकुछ भूल कर इस पल को जी रहा था ,ऐसा ही कुछ माया के साथ हो रहा था ,वो निगाहों और स्पर्श के जादुई दुनिया से वापस आना ही नहीं चाह रही थी .

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03/08/2018

मीरा पार्ट -2

Filed under: Social issue — ratnakarmishra @ 3:33 am

होली प्यार और रंगों का त्योहार

हम हिन्दुस्तानियों की बहुत सारी खूबियों मैं एक खूबी ये  है की ,हम घर से कितनी भी दूर रहे ,मगर अपना त्योहार मनाना नहीं भूलते और  बात अगर होली जैसे त्योहार की हो तो क्या कहने .

पिछले कुछ सालो से ‘काम’ अपने नोट्टिंग हिल वाले बंगले पे होली का आयोजन करता था.

तुम्हे पता है काम मुझे होली का त्योहार बचपन से ही पसंद नहीं है ,मीरा ने चाय की सिप लेते हुए कहा .

हम्म ,अपने मोबाइल फोन मैं आँख गड़ाए हुए काम ने जबाब दिया .

मैं तुमसे कुछ कह रही हूँ ,और तुम हो की फ़ोन पे लगे हो मीरा ने खीज कर कहा .

अरे –अरे गुस्सा मत करो ,कुछ लोगो को इनवाइट कर रहा था होली पे आने को ,लो अब रख दिया फोन

तो तुम क्या कह रही थी ,तुम्हे होली जैसा त्यौहार पसंद नहीं है  ,इसका मतलब ये हुआ की तुम्हें अब तक प्यार नहीं हुआ है ?

होली और प्यार का क्या संबंध ? मीरा ने कहा .

होली और प्यार का बहुत पुराना संबंध है ,भगवान कृष्ण के काल से .

वो कैसे ?

पूतना द्वार जहरीला दूध पिलाने के कारण जब कृष्ण का शरीर नीला पड़ गया तब वो एक दिन परेशान होकर अपनी माँ यशोदा के पास गए और कहा ये गोरी राधा और उसकी सखिया अब मुझसे प्यार नहीं करेगी ,क्योंकि मेरा रंग नीला है और उनका गोरा .तब उनकी माँ ने उनसे कहा तुम्हें जो भी रंग पसंद है उससे राधा का चेहरा रंग दो ,फिर देखो .

अच्छा तो इसलिए तुम सभी अंग्रजो को रंग कर अपने रंग मैं मिला लेते हो हँसते हुए मीरा ने कहा .

हाँ कुछ –कुछ ऐसा ही समझो .

बातें बहुत हो गयी चलो अब कुछ काम कर लिया जाए ,कुछ देर मैं लोग आने वाले ही होंगे .

लांन मैं कलर के डब्बों को सजाते हुए मीरा ने पूछा

काम तुमने ये बताया ही नहीं तुम्हे कौन सा रंग पसंद है ?

नीला .

नीला ही क्यों ?

क्योंकि ये आत्मा और प्यार दोनों का रंग है .

03/03/2018

डार्क नाईट मीरा पार्ट -१

Filed under: Social issue — ratnakarmishra @ 3:46 am

मीरा

रोहित क्या किसी का नाम “काम” हो सकता है ?

गाडी मैं अपना सामना रखते हुए मीरा ने कहा .

क्या ? रोहित ने सीट बेल्ट लगाते हुए आश्चर्य से कहा

हाँ मुझे बभी बड़ा अजीब सा नाम लगा .

कार Heathrow एअरपोर्ट से निकल कर सेंट्रल लंदन की और दौड़ लगा रही थी .

हाँ ,कुछ तो अजीब सा हुआ था मेरे साथ ,मेरे बदन का जलना और वो आग ,मैं उस ‘काम’ और कबीर को अपने दिमाग से निकाल नहीं पा रही हूँ .

अब ये ‘ काम ‘ का क्या चक्कर है ?और ये कबीर कौन है ?मीरा को अपने मैं बुदबुदाते देख रोहित ने पूछा .

कुछ नहीं ,तुम ड्राइविंग पे कंसन्ट्रेट करो मैं जरा आराम करती हूँ .

मीरा ने जैसे ही आँखे बंद की उसके सामने कबीर और काम का चेहरा नज़र आने लगा .

रोहित तुम मुझसे कितना प्यार करते हो ?

क्या ?

अचानक से पूछे गए इस सवाल पर रोहित ने अपना चेहरा ऐसा बनाया जैसे की अभी –अभी उसने करेला खाया हो .

अरे इसमें मुह बनाने वाली बात कहाँ है, मैं तो बस पूछ रही थी कि ,खैर छोड़ो .ऐसा करो साइड करके गाड़ी रोक दो .

ये क्या मजाक है मीरा ?  रोहित ने गुस्से मैं कहा .

कुछ नहीं बस साइड करके रोक दो ,बड़े ही शांत स्वर मैं मीरा ने कहा ,मगर जिस अंदाज़ से उसने अपनी आँखे दिखाए रोहित ने कार साइड कर दी .

और हाँ ,आज के बाद तुम मुझे कांटेक्ट करने की कोई कोशिश भी मत करना और मेरा जो सामान तुम्हारे फ्लैट मैं प है वो भिजवा देना .एक आदेश सा देने वाला भाव था उस समय मीरा के चेहरे पे.

रोहित अचानक से आये मीरा मैं आये इस बदलाव को समझ नहीं पा रहा था ,उसे लगा उसने कोई गलती की है

I am sorry मीरा ,यदि मैंने कोई गलती की है तो माफ़ कर दो .मगर इस तरह से ….

मगर मीरा ने उसकी बात को अनसुना करते हुए अपने मोबाइल से एक नंबर डायल किया .

कुछ देर बाद तक वो रोहित की कार को देखती रही जब तक की वो ओझल नहीं हो गयी .

तभी उसका ध्यान एक गाड़ी के हॉर्न ने तोड़ा जो उसके पास आ कर रुकी .

मैं ने सोचा था की तुम मेरे साथ आओगी मगर ,

बात को बीच मैं ही काटते हुए मीरा ने कहा ‘काम ‘ मैं रोहित के साथ अपने रिश्ते को एक मौका देना चाहती थी .

03/02/2018

मैं भी भगत सिंह

Filed under: Social issue — ratnakarmishra @ 9:31 am

आजादी आसानी से नहीं मिली थी , इसके लिए  बहरी अंग्रेज सरकार को  अपनी बात सुनाने के लिए सबने अपने -अपने ढंग से  कोशिश की गई थी ,भगत सिंह ने जहाँ असेंबली मैं बम फेका था ,बॉस ने अपनी आर्मी  बनाई थी ,गांधी ने जहाँ अहिंसा का रास्ता अपनाया था ,ऐसे सेकड़ो क्रांतिकारियों के बलिदान के बाद  हम आजाद हुए थे ,आजादी कुर्बानी से आई थी ,मांग कर नहीं .

मगर इस आजादी का क्या फायदा ,हमें आजाद हुए आठ दशक हो चुके है ,फिर भी हम गुलाम हैं ,हम गुलाम हैं अपनी सोच के ,एक ऐसी सोच जो की दो और चार कमरे के मकानों मैं सिमटी हुई है , जहाँ  टीवी  देखते हुए हम ये कहते है ,ये क्या  बकवास  है ,मगर फिर भी रिमोट को हरकत मैं नहीं लाते .हम गुलाम है उस जातिवाद के जो हमें तरक्की के बारे मैं सोचने नहीं देता . हम फसे हुए हिंदु मुस्लिम डिबेट मैं

हम उस मानसिकता के गुलाम है जो हमें  लड़के और लडकियों मैं भेद  -भाव करवाता है , अकेली लड़की को अलग नज़र से देखता है .

हम अन्याय के खिलाफ  बेबस और लाचार बने रहने के गुलाम है .ऑफिस मैं बॉस के गुलाम है  .

हम आजाद ही कब हुए ,शायद सन 1947 मैं एक सा दिन था ,जैसा की हरेक साल त्यौहार आते है ,उस दिन  जम के मज़े करो और फिर अगली सुबह से गुलाम बन जाओ .

अब मैं भी भगत सिंह बनना चाहता हूँ ,इस गुलामी की जंजीरों को तोड़ना चाहता हूँ .

 

 

01/16/2018

इ गया हो दोसरका

Filed under: Review — ratnakarmishra @ 6:05 pm

देखिए हम जो ashok_rajpathभी कहते है ,वो सामने मैं कह देते है ,पीठ पीछे कहने मैं वो मज़ा नहीं आता ,क्योंकि चेहरवा का रंग बदलते और उड़ते देखने का अपना ही अलग मज़ा है . इसलिए अवधेश प्रीत जी की किताब सामने मैं रख के लिख रहा हूँ ,ये मेरा इस साल का दूसरा विकेट है .

“अशोक राजपथ ” वैसे जो पटना से तालुक नहीं रखते उन्हें ये मैं बता देता हूँ ,की ये एक सड़क है जो पटना के छोर से दुसरे छोर को जोड़ती है , पटना का दिल तो नहीं कह सकते मगर  दिल से कम भी नहीं है .बड़े -बड़े खेल हुए है यहाँ अरे न -न इतनी भी चौड़ी नहीं है की कोहालिया आ के शतक मार देगा ,संकरी सी है दोनों और दुकाने …..अरे अरे इ का हम आप को बताने लग गए किताब आर्डर कर के मंगाइए और खुद ही पता कर लीजिये क्या है ?क्या नै है ?

वैसे रिव्यु वगेरह पढ़ –पुर के कुछ करने मैं विश्वास रखते है तो बता देते है ,कहानी ऊ टाइम की है जब फ़ोन करे के और सुने दोनों का पैसा लगता था ,इ नहीं की जियो लगाए और जियो –जियो कर रहे है रात भर ,बस पटना के कुछ बदनाम हॉस्टल का सचित्र वर्णन है ,कहानी एक दम खांटी बिहारी स्टाइल मैं है ,बस लिट्टी चोखा का कमी दिखा ,वैसे मुर्गा -भात और दारू के साथ स्टूडेंट यूनियन का चर्चा अच्छा रहा ,मगर कहानी कुछ –कुछ अधूरी रही ,अब शायद पार्ट -2 आवे वाला होगा इसका .जैसे –जैसे किताब ख़तम हो रही थी नशा चढ़ते जा रहा था ,मगर ससुरा और पिबे का मन था मगर ऐसा लगा की दारुबंदी हो गयी .

मैं आशा करता हूँ कि एकर दूसरा पार्ट आवे नहीं तो हमरे बहुत से सवाल का जबाब अवधेश प्रीत जी से लेना पड़ेगा .

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