Ratnakar Mishra

01/16/2018

इ गया हो दोसरका

Filed under: Review — ratnakarmishra @ 6:05 pm

देखिए हम जो ashok_rajpathभी कहते है ,वो सामने मैं कह देते है ,पीठ पीछे कहने मैं वो मज़ा नहीं आता ,क्योंकि चेहरवा का रंग बदलते और उड़ते देखने का अपना ही अलग मज़ा है . इसलिए अवधेश प्रीत जी की किताब सामने मैं रख के लिख रहा हूँ ,ये मेरा इस साल का दूसरा विकेट है .

“अशोक राजपथ ” वैसे जो पटना से तालुक नहीं रखते उन्हें ये मैं बता देता हूँ ,की ये एक सड़क है जो पटना के छोर से दुसरे छोर को जोड़ती है , पटना का दिल तो नहीं कह सकते मगर  दिल से कम भी नहीं है .बड़े -बड़े खेल हुए है यहाँ अरे न -न इतनी भी चौड़ी नहीं है की कोहालिया आ के शतक मार देगा ,संकरी सी है दोनों और दुकाने …..अरे अरे इ का हम आप को बताने लग गए किताब आर्डर कर के मंगाइए और खुद ही पता कर लीजिये क्या है ?क्या नै है ?

वैसे रिव्यु वगेरह पढ़ –पुर के कुछ करने मैं विश्वास रखते है तो बता देते है ,कहानी ऊ टाइम की है जब फ़ोन करे के और सुने दोनों का पैसा लगता था ,इ नहीं की जियो लगाए और जियो –जियो कर रहे है रात भर ,बस पटना के कुछ बदनाम हॉस्टल का सचित्र वर्णन है ,कहानी एक दम खांटी बिहारी स्टाइल मैं है ,बस लिट्टी चोखा का कमी दिखा ,वैसे मुर्गा -भात और दारू के साथ स्टूडेंट यूनियन का चर्चा अच्छा रहा ,मगर कहानी कुछ –कुछ अधूरी रही ,अब शायद पार्ट -2 आवे वाला होगा इसका .जैसे –जैसे किताब ख़तम हो रही थी नशा चढ़ते जा रहा था ,मगर ससुरा और पिबे का मन था मगर ऐसा लगा की दारुबंदी हो गयी .

मैं आशा करता हूँ कि एकर दूसरा पार्ट आवे नहीं तो हमरे बहुत से सवाल का जबाब अवधेश प्रीत जी से लेना पड़ेगा .

Advertisements

01/11/2018

अब तक Fifty Two

Filed under: Review — ratnakarmishra @ 4:56 pm

फेर मैं मत पड़ो हम कुछ ऐसा वैसा नहीं लिखने वाले जैसा तुम सोच रहे हो ,वैसे भी ये Fifty वाला टाइटल ..अब केतना लिखे जिनको समझना -बुझना होगा वो बुझ गए होंगे .अब बात वो जो मैं करने वाला हूँ ,साल की शुरवात हुई है  ,सभी लोग नए-नए संकल्प के साथ उतरे है मैदान मैं , अपने इंडियन क्रिकेट टीम को छोड़ के .बस मैंने भी कमर कस ली और मैदान मैं उतर गया नए साल मैं नया कुछ करने ,और काफी दिमाग लगाने के बाद (करीब चार सेकंड ) के बाद मैंने फैसला किया की मैं बुक रिव्यु करूँगा दुसरे की टांग खीचने का मज़ा कुछ और ही है ,वैसे भी औकात से बाहर का काम करने का कुछ और ही मज़ा है .

अब इस साल का मेरा पहला शिकार है कॉरपोरेट कबूतर एक चीज़ कहेंगे इ किताब   के बारे मैं इ किताब एक दम चाइनीज़  फिल्म टाइप से है ,पूरा  फिल्म देख लो मगर ससुरा ड्रैगन दर्शन नहीं देगा .

छोटी -छोटी कहानी का कम्पलीट पैकेज है , कुछ बहुत उम्दा है तो कुछ कहानी बस पढ़ लिया वाला स्टाइल मैं है  , बस एक शिकायत है मुझे शान भाई साब से एक गो भी कहानी मैं बिहार नज़र नहीं  आया जबकि भाई साब पूरा का पूरा बिहारी है . बस कबूतर टाइप से मुंबई और देल्ही मैं उड़ते नज़र आये ,

ज्यादा नहीं लिख पाउँगा इसके बारे मैं क्योंकि ठण्ड  से  हाथ जम रही है .

 

 

 

03/28/2017

बच के रहना ,चेतन की नयी फिल्म आ रही है

Filed under: Review — ratnakarmishra @ 4:18 pm

बच के रहना ,चेतन की नयी फिल्म आ रही है ,कौन चेतन अब ये मत पूछ बैठना ,अरे वही जिसने हिंदी मीडियम के लौंडे के हाथ मैं अंगेजी नावेल थमा दिया ,और जिसे लौंडे बड़े स्टाइल से उसे हाथ मैं लेकर कॉलेज ,स्कूल ,ट्रेन और बसों मैं पाए जात्ते थे ,बड़ा कूल –कूल सा फीलिंग आता होगा उन्हें .

बात पुरानी नहीं तो नयी भी नहीं रही , बाद मैं बहुत से लोग आये –गए मगर चेतन से मुकाबला नहीं कर पाए चेतन ने जो नब्ज़ पकड़ी हिंदुस्तान की वो “five point someone” से लेकर “One Indian Girl” जो कोई नहीं पकड़ पाया .

वो एक “मॉस राइटर “है न की “क्लास  राइटर” अब जिस पे जनता मेहरबान तो क्या करेगा उसका जहान ,

मेरे या आपके जान-पहचान मैं ऐसे बहुत सारे लोग मिल जायेंगे,जो सिर्फ और सिर्फ चेतन को ही पढते है ,मगर आज कल कुछ लोग हमारे पोस्ट को भी पढ़ लेंगे

समय बदला चेतन ने किताब के साथ –साथ फिल्मो मैं भी अपना हाथ अजमाना शुरू किया ,अब आज दोपहर मैं उसने अपनी नयी फिल्म “हाफ गर्लफ्रेंड “का पोस्टर साझा  किया , जिसके बारे मैं उसने अपने फेसबुक पोस्ट पे दो दिन पहले से ही बता रखा था  ,सब प्यारे  लौंडे जाओ और ऑनलाइन किताब का आर्डर दो नहीं तो जो भी हाफ गर्लफ्रेंड है वो भी भाग जाएगी ,और हाँ पोस्टर देखना मत भूलना .

12/19/2016

देल्ही दरबार के का कहने

Filed under: Social issue — ratnakarmishra @ 3:24 pm

img_20161218_130804-2

रविवार को भोरे -भोरे फ़ोन आया हमरे एक दोस्त का पूछा का कर रहे बे मिश्रा !

हम देल्ही दरबार लगा के बैठे है बे ,तू सुना

अबे साले अब कहने  और  सुंनाने के लिए का रहा है बे ,भोरे -भोर हमको अकेले छोड़ के निकल लिए देल्ही दरबार ,

ससुरा बड़का खौवाक हो बे सुबहे -सुबहे चिकेन तोड़ने पहुच गए  .

अबे गलतफहमी के चूरन हम किताब पढ़ रहे है,सत्य व्यास भैया का ” देल्ही दरबार”  न की चिकेन तोड़ रहे है  देल्ही -दरबार रेस्टोरेंट मैं .

ओह्ह जे बात ,पढ़ लोगो तो हमको भी देना जरा ,

जरा का बे ,संगीतया पे रोजे सौ -दू सौ उड़ता है  बे  ,अमेज़न से खरीद ले ,हमरे पास ऑटोग्राफ वाला है,हम न देंगे .

बस यही दोस्ती और प्यार बीच मैं आ गयी व्यास भैया की किताब ,सौरभ ने टोन मारा मेरे को

ठीक है ठीक ले लियो मगर पिछली बार की तरह  इसे भी गुम मत कर दियो .

कौन सा किताब हम तुम्हारा गम किये है बे ?

“बनारस टाकीज ”

वो उ तो हम गिफ्ट कर दिए थे ,सुरभि को

साला अभी बता रहा बे ,आ सामने ऐसा रगड़े गे न की ….

मेरी बात को बीच मैं ही काट के उसने कहा अबे उ हमसे सेट हो गयी थी , बनारस की थी न ,इस लिए दिए थे गिफ्ट मैं

ओह्ह ,रख फोन रख अब लियो मेरे से कोई किताब .

अरे बुरा मान गए बे ,कोई बात नहीं किताब मत दियो मेरे को मगर कहानी के बारे मैं बता दियो .

रख फोन रख फ़ोन बे

रख रहे है का भाव खा रहा है वैसे फ़ोन तो तू भी काट सकता है न बे

रख -रख ….

 

 

08/25/2016

अंरेज़ी दारू की कहानी !!

Filed under: Social issue — ratnakarmishra @ 4:30 pm

सोचो –सोचो वो कितना बड़ा नशेड़ी होगा जिसने पहली बार दारू का नशा चखा होगा ,अब पी पी के सर क्यों खुजला रहे हो  ,कि किसने बनाई होगी दारू पहली बार और सजाई होगी महफ़िल दोस्तों के साथ ? शायद होगा कोई  सच्चा आशिक जिसकी मसूका पड़ोस के लल्लन के साथ भाग गयी होगी ? वैसे मैंने सुना और पढ़ा है अरे न रे उसकी माशूका के बारे मैं नहीं ,दारू के बारे मैं कि  ,

बेबीलोन वाले आज से कुछ 4200 -4300 साल पहले शराब की देवी की पूजा करते थे जो की उस समय शहद और पानी से बनता था ,अब घर मैं बनाने मत लग जाना भाई लोग .

बियर के शौक़ीन तो इससे भी पुराने निकले  10000 से 12000 साल पहले से ही लोग इसका मज़ा ले रहे है ,कहते है की महशूर गिज़ा की पिरामीड बनाते समय हरेक मजदूर को बतौर राशन एक गैलन वाइन मिलती थी ,मज़े थे उनके भी उस समय लगभग हरेक मौको के लिए वाइन बनाई जाती थी ,जैसे खेल ,शादी ,पूजा किसी के मरने पर, दवाई के रूप मैं पुरे 17 तरह के बियर और 24 अलग –अलग स्वाद वाले वाइन मजे भरे दिन थे , वो भी क्या !

और जैसे ग्रीक वालो ने तो दारू को  प्रमोट  करने का ठेका ले लिया हो ,उनका मानना था की दारू पीने से लोग एक दुसरे के करीब आते है ,वो  सच हैं ,अभी भी ऐसा ही होता है .

रोम वालो ने सबकी सोच से दो कदम आगे निकल गए उन्होंने दारू को सिर्फ जरुरी ही नहीं बनाया बल्कि कुछ खेल भी उसके साथ जोड़ा जैसे ,पी –पी के उलटी करना ,खाली पेट पीना ,बॉटम्स उप करना ,ग्लास मैं पिने के बदले पाइप से पीना ,बड़े ही अजीबोगरीब एक्सपेरिमेंट कर मारा रोम वालो ने .

अब जहाँ हमारे देश के सवाल है हम पियक्कर कब बने हमें भी नहीं मालूम

हमारे यहाँ तो देवता लोग इसे सोमरस कह के ,पीते थे , “सोम” और “सूरा” के नाम से भी ये जाने जाते थे ,सोम सभ्य लोग आज के इलीट क्लास कह सकते है उनका ड्रिंक था और सूरा उस समय छत्रियो का क्योंकि ये सोम से ज्यादा स्ट्रोंग होता था ,हमारे यहाँ पे दारू की पहली निशानी वैदिक काल मैं मिली है करीब 3200 साल पुरानी ,फिर हमने इसे दवा के रूप मैं इस्तेमाल करना शुरू किया था ,फिर हमारे यहाँ मुग़ल आये और अपने साथ नए –नए फ्लेवौर लाये मुगलों ने बरसो तक हम पे राज किया उसके बाद अँगरेज़ आये और भैया तब से हमारे यहाँ अंग्रेजी दारू मिलनी शुरू हुई बस ख़तम हुई दारू की कहानी बे अब क्या पूरी बोतल खाली करने के बाद ही उठोगे क्या !

Next Page »

Create a free website or blog at WordPress.com.